समान नागरिक संहिता के राष्ट्रीय मसौदे पर विचार-विमर्श तेज: शीतकालीन सत्र में पेश हो सकता है बिल
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के सफलतापूर्वक लागू होने के बाद, अब केंद्र सरकार पूरे देश के लिए एक 'राष्ट्रीय यूसीसी मसौदा' तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

विधि आयोग और केंद्रीय कानून मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के बीच चल रही बैठकों के दौर से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि सरकार इस साल के अंत तक, संभवतः संसद के शीतकालीन सत्र में, राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता विधेयक पेश करने की पुख्ता तैयारी कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रीय मसौदा काफी हद तक उत्तराखंड के यूसीसी मॉडल से प्रेरित होगा, लेकिन इसमें देश की व्यापक सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय समुदायों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए जा रहे हैं। ज्ञात हो कि पूर्वोत्तर के राज्यों और मध्य भारत के आदिवासी बहुल इलाकों से यूसीसी को लेकर भारी विरोध के स्वर उठे थे। संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासियों को उनके प्रथागत कानूनों के संरक्षण की गारंटी दी गई है। इसे देखते हुए, सरकार राष्ट्रीय यूसीसी में अधिसूचित जनजातीय समुदायों को पूरी तरह से छूट देने का मन बना चुकी है, ताकि इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार के राष्ट्रीय आंदोलन को टाला जा सके।
यूसीसी का मुख्य उद्देश्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत और गोद लेने के मामलों में धर्म के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाना है। विशेष रूप से बहुविवाह (Polygamy) पर पूर्ण प्रतिबंध, विवाह की न्यूनतम आयु का एक समान निर्धारण और पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार देने जैसे प्रगतिशील प्रावधान इस ड्राफ्ट के मुख्य स्तंभ होंगे। इसके अलावा, लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) के अनिवार्य पंजीकरण का जो नियम उत्तराखंड में लागू किया गया है, उसे भी राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर विचार किया जा रहा है, हालांकि इसे लेकर नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं में भारी रोष है।
राजनीतिक मोर्चे पर, यूसीसी का मुद्दा हमेशा से ही ध्रुवीकरण का कारण रहा है। अल्पसंख्यक संगठनों, विशेषकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन बताते हुए इसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है। विपक्षी गठबंधन भी इस मुद्दे पर बंटा हुआ नजर आ रहा है। जहां कुछ दलों का मानना है कि यह केवल चुनावी ध्रुवीकरण का हथकंडा है, वहीं कुछ दल सैद्धांतिक रूप से महिलाओं के समान अधिकारों के पक्ष में हैं लेकिन सरकार के ‘तरीके’ का विरोध कर रहे हैं।
कानून मंत्री ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से स्पष्ट किया था कि यूसीसी का उद्देश्य किसी धर्म की प्रथाओं को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी (महिलाओं) को उनके उचित संवैधानिक अधिकार दिलाना है। बहरहाल, राष्ट्रीय यूसीसी का ड्राफ्ट जैसे ही सार्वजनिक पटल पर आएगा, यह तय है कि देश में एक बार फिर कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक बहस का एक नया और ज्वलंत अध्याय शुरू हो जाएगा।




