यूपी: सरकारी स्कूलों के मर्जर मामले की सुनवाई करेगा शीर्ष कोर्ट

UP: Supreme Court will hear the merger case of government schools

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर स्कूल को दूसरे स्कूलों को समाहित करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी। शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई करने की सहमति देते हुए कहा कि वैसे तो यह नीतिगत मामला है, लेकिन फिर भी यदि सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं तो हम इस मुद्दे की समीक्षा करने को तैयार हैं। राज्य में करीब 5000 स्कूलों को मर्जर किए जाने का आरोप है। जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष उत्तर प्रदेश सरकार के 16 जून के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता तैय्यब खान सलमानी की ओर से अधिवक्ता प्रदीप यादव ने याचिका का उल्लेख करते हुए, इस मामले पर तत्काल सुनवाई करने का आग्रह किया।अधिवक्ता यादव ने पीठ से कहा कि यदि 16 जून के राज्य सरकार के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई, तो बड़ी संख्या में प्राथमिक स्कूल बंद हो जाएंगे और वहां पढ़ने वाले हजारों छात्रों को दूर दराज के स्कूलों में पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसके बाद, पीठ ने इसी सप्ताह मामले की सुनवाई करने पर सहमति जताई।मामले की जांच की जाएगी : जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हालांकि यह एक नीतिगत फैसला है, फिर भी यदि सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं, तो वे इस मुद्दे की जांच को तैयार हैं। याचिकाकर्ता सलमानी की याचिका में कहा गया कि 16 जून को राज्य सरकार के बेसिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने एक आदेश जारी कर बेसिक शिक्षा अधिकारी की देखरेख और नियंत्रण में प्रबंधित और राज्य सरकार के स्वामित्व वाले स्कूलों को दूसरे स्कूलों में समाहित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया था।हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने 7 जुलाई को मामले के वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किए बगैर याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिका में कहा गया कि स्कूलों को दूसरे स्कूलों में विलय का आदेश राज्य में पहले से ही कमजोर शिक्षा व्यवस्था को सीधे प्रभावित और नष्ट कर देगा। निर्णय मनमाना और अनुचित याचिका में कहा गया कि सरकार का यह नीतिगत निर्णय मनमाना, अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 21ए का उल्लंघन है क्योंकि यह बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों और राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन करता है।

 

 

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