तो एक आरोपी द्वारा किया गया कृत्य ही सभी को सजा देने के लिए पर्याप्त
So the act committed by one accused is enough to punish all of them.

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि साझा इरादा यानी कॉमन इंटेंशन साबित हो जाता है, तो केवल एक व्यक्ति द्वारा दुष्कर्म का कृत्य करने पर भी सभी शामिल व्यक्तियों को सामूहिक दुष्कर्म के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह फैसला शुक्रवार को सुनाया।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि सामूहिक दुष्कर्म के मामले में यदि सभी ने साझा मंशा के तहत कृत्य किया हो, तो एक आरोपी द्वारा किया गया कृत्य ही सभी को सजा देने के लिए पर्याप्त है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस धारा के तहत यदि एक से अधिक व्यक्तियों ने साझा इरादे के साथ अपराध में भाग लिया, तो यह साबित करने की जरुरत नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति ने दुष्कर्म का कृत्य किया। यह टिप्पणी मध्य प्रदेश में साल 2004 में एक महिला की किडनैपिंग और सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आरोपी की दोष सिद्धि को बरकरार रखते हुए की गई। आरोपी राजू ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा उसकी सजा को बरकरार रखने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
बता दें घटना जून 2004 की है, जब पीड़िता एक विवाह समारोह से लौट रही थी। तभी उसका अपहरण कर लिया और उसे कई स्थानों पर रखा गया। पीड़िता ने अपने बयान में बताया था कि जलंधर कोल और अपीलकर्ता राजू नाम के दो लोगों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। सरकारी वकील ने 13 गवाह पेश किए, जिनमें पीड़िता, उसके पिता और जांच अधिकारी शामिल थे। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को गैंगरेप, अपहरण और अवैध बंदीकरण के आरोप में दोषी माना। राजू को आजीवन कारावास और जलंधर कोल को 10 साल की सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद राजू सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जलंधर कोल ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी।
कोर्ट ने प्रमोद महतो बनाम बिहार राज्य (1989) के मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में यह जरुरी नहीं कि प्रत्येक आरोपी द्वारा दुष्कर्म के पूर्ण कृत्य का स्पष्ट प्रमाण हो। यदि उन्होंने एकसाथ कार्य किया हो और पीड़िता के साथ दुष्कर्म की मंशा में सहभागी हों, तो सभी दोषी होंगे। हालांकि, कोर्ट ने राजू पर एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, क्योंकि यह साबित नहीं हो सका कि अपराध पीड़िता की जाति के आधार पर किया गया था।




