डीपफेक और एआई का राजनीतिक दुरुपयोग: चुनाव आयोग ने जारी की नई और सख्त गाइडलाइंस

राजनीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक वीडियो के बढ़ते और खतरनाक उपयोग पर लगाम कसने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने 30 अप्रैल को नई और बेहद सख्त गाइडलाइंस जारी कर दी हैं।

पिछले कुछ उप-चुनावों और राज्य विधानसभा चुनावों में जिस तरह से एआई-जनित ऑडियो और वीडियो के माध्यम से नेताओं के फर्जी बयान वायरल किए गए, उसने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया था।

नई गाइडलाइंस के तहत, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों द्वारा किसी भी प्रकार के सिंथेटिक मीडिया  या एआई-निर्मित सामग्री का उपयोग बिना स्पष्ट ‘डिस्क्लेमर’  के नहीं किया जा सकता। यदि कोई पार्टी अपने प्रचार के लिए एआई का उपयोग कर रही है, तो उस वीडियो या ऑडियो के शुरुआत और अंत में स्पष्ट रूप से यह घोषणा करनी होगी कि “यह सामग्री आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा निर्मित है।”

सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आयोग ने कहा है कि यदि कोई उम्मीदवार या राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वंद्वी की छवि खराब करने के लिए दुर्भावनापूर्ण डीपफेक वीडियो का निर्माण या प्रसार करता है, तो इसे ‘भ्रष्ट आचरण’ और ‘साइबर अपराध’ माना जाएगा। ऐसे मामलों में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम  के तहत सीधे आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा। दोष सिद्ध होने पर उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने और चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने तक का प्रावधान इन नए नियमों में शामिल किया गया है।

आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब) को भी सख्त निर्देश जारी किए हैं। टेक कंपनियों को चुनाव के दौरान एक ‘नोडल ऑफिसर’ नियुक्त करना होगा और यदि चुनाव आयोग किसी डीपफेक वीडियो को हटाने का आदेश देता है, तो उसे अधिकतम 3 घंटे के भीतर प्लेटफॉर्म से हटाना अनिवार्य होगा। यदि टेक कंपनियां इसमें विफल रहती हैं, तो उन्हें ‘सेफ हार्बर’  सुरक्षा से वंचित कर दिया जाएगा और उन पर भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ने चिंता जताते हुए कहा, “तकनीक का विकास मानव प्रगति के लिए है, लेकिन जब इसका इस्तेमाल मतदाताओं को भ्रमित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को हाईजैक करने के लिए किया जाता है, तो आयोग मूकदर्शक नहीं रह सकता। मतदाताओं का यह मौलिक अधिकार है कि वे सच और झूठ के बीच का अंतर जान सकें।”

राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग के इस कदम का सैद्धांतिक रूप से स्वागत किया है, लेकिन कुछ विपक्षी नेताओं ने चिंता जताई है कि इन नियमों का इस्तेमाल सत्ता पक्ष द्वारा सोशल मीडिया पर सरकार की जायज आलोचना को दबाने के लिए भी किया जा सकता है। आने वाले चुनावों में चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन नियमों को निष्पक्षता और तेज़ी से लागू करने की होगी, क्योंकि डिजिटल दुनिया में झूठ की रफ्तार सच से कई गुना तेज होती है।

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