एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में केंद्र का बड़ा कदम: चुनाव आयोग ने साझा किया रोडमैप, विपक्ष ने उठाए सवाल
प्रधानमंत्री के सबसे महत्वाकांक्षी चुनावी सुधारों में से एक 'एक देश, एक चुनाव को जमीनी स्तर पर लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार ने अपने कदम और तेज कर दिए हैं।

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद, अब भारत निर्वाचन आयोग ने 2029 तक पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का एक विस्तृत रोडमैप कानून मंत्रालय के साथ साझा किया है।
चुनाव आयोग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस विशाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को एक साथ संपन्न कराने के लिए आयोग को लगभग 30 लाख अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और वीवीपैट मशीनों की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती और मतदान केंद्रों पर रसद व्यवस्था के लिए एक व्यापक बजट का अनुमान भी वित्त मंत्रालय को भेजा गया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए उसे कम से कम डेढ़ से दो साल का ‘तैयारी का समय’ चाहिए, ताकि मशीनों का निर्माण और परीक्षण समय रहते किया जा सके।
हालांकि, सरकार के इस कदम से विपक्षी दलों के खेमे में भारी बेचैनी है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके ने इस पहल को ‘संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार’ करार दिया है। विपक्ष का आरोप है कि एक साथ चुनाव कराने से राष्ट्रीय मुद्दों की आंधी में क्षेत्रीय मुद्दे पूरी तरह से दब जाएंगे, जिससे राष्ट्रीय पार्टियों (विशेषकर सत्ताधारी दल) को अनुचित लाभ मिलेगा। विपक्षी नेताओं का यह भी तर्क है कि यदि किसी राज्य सरकार का पांच साल से पहले पतन हो जाता है (जैसे त्रिशंकु विधानसभा या अविश्वास प्रस्ताव के कारण), तो वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ेगा, जो कि लोकतंत्र के खिलाफ है।
सरकार की ओर से इस मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए संसदीय कार्य मंत्री ने कहा है कि कोविंद समिति की रिपोर्ट में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। ऐसे मामलों में केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए ही मध्यावधि चुनाव कराए जाएंगे, ताकि अगला चुनावी चक्र बाधित न हो।
इस व्यवस्था को लागू करने के लिए सरकार को संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में महत्वपूर्ण संशोधन करने होंगे। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी इसे पारित कराना होगा। चूंकि वर्तमान में कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं, इसलिए राज्य विधानसभाओं से इसे पारित कराना सरकार के लिए एक टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आगामी मानसून सत्र में सरकार इस दिशा में पहला संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश कर सकती है, जिससे संसद में एक बार फिर जोरदार हंगामे के आसार बन गए हैं।




