2026 परिसीमन की सुगबुगाहट: उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच गहराया राजनीतिक तनाव, केंद्र ने बुलाई सर्वदलीय बैठक

भारतीय राजनीति में अगले एक दशक की दिशा तय करने वाले सबसे संवेदनशील मुद्दे 'परिसीमन 2026' को लेकर राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक हलचल अचानक तेज हो गई है।

संविधान के अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाना है। 1976 के बाद से सीटों की संख्या पर लगी रोक (फ्रीज) के समाप्त होने का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा है, उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच एक अघोषित राजनीतिक युद्ध छिड़ता नजर आ रहा है। इस बढ़ते तनाव को देखते हुए, केंद्र सरकार ने मई के दूसरे सप्ताह में एक अहम सर्वदलीय बैठक बुलाने का संकेत दिया है।

दक्षिण भारतीय राज्यों—विशेषकर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना—के मुख्यमंत्रियों ने एक सुर में केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के परिसीमन से संघीय ढांचे  को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने दशकों से राष्ट्रीय परिवार नियोजन नीतियों का सख्ती से पालन किया और जनसंख्या वृद्धि दर (TFR) को नियंत्रित किया, उन्हें अब संसद में अपनी सीटें खोकर ‘सफलता की सजा’ नहीं दी जानी चाहिए। दक्षिणी नेताओं का स्पष्ट कहना है कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों का लोकसभा में वर्चस्व इस कदर बढ़ जाएगा कि राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण की आवाज पूरी तरह से हाशिए पर चली जाएगी।

दूसरी ओर, उत्तर भारतीय राज्यों के नेताओं और कई संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश का एक सांसद लगभग 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि केरल का एक सांसद 15 लाख लोगों का। उत्तर के नेताओं का कहना है कि यह लोकतांत्रिक असमानता है और संविधान के अनुच्छेद 82 का पालन करते हुए परिसीमन अब और नहीं टाला जाना चाहिए। नए संसद भवन का निर्माण भी इस बात का प्रबल संकेत है कि भविष्य में सांसदों की संख्या 543 से बढ़कर 800 के पार जा सकती है।

इस बीच, सत्ता के गलियारों में इस बात की भी जोरदार चर्चा है कि केंद्र सरकार टकराव टालने के लिए एक ‘मध्यम मार्ग’  तलाश रही है। सूत्रों के अनुसार, एक प्रस्ताव यह है कि कुल सांसदों की संख्या तो बढ़ाई जाए, लेकिन प्रत्येक राज्य का लोकसभा में जो प्रतिशत हिस्सा  1971 में था, उसे ही बरकरार रखा जाए। इसके अलावा, राज्यसभा में अमेरिका की तर्ज पर हर राज्य को समान प्रतिनिधित्व देने के फार्मूले पर भी विचार किया जा रहा है।

आगामी सर्वदलीय बैठक में सरकार विपक्षी दलों और विशेषकर क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने ये प्रस्ताव रख सकती है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा इतना जटिल है कि इस पर आम सहमति बनाना मोदी सरकार के इस कार्यकाल की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होगी। यदि इस मुद्दे को सावधानी से नहीं संभाला गया, तो यह भारत के उत्तर-दक्षिण विभाजन को एक स्थायी और खतरनाक राजनीतिक खाई में बदल सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button