चुनाव आयोग के नोटिस पर कांग्रेस का कड़ा पलटवार: जयराम रमेश ने EC की कार्यप्रणाली को बताया ‘कैजुअल’ और ‘एकतरफा
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को चुनाव आयोग (EC) द्वारा जारी किए गए कारण बताओ नोटिस ने राष्ट्रीय राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है।

बुधवार को चुनाव आयोग ने खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर ‘आतंकवादी’ शब्द के इस्तेमाल को आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन मानते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा था। लेकिन, कांग्रेस पार्टी ने बैकफुट पर जाने के बजाय चुनाव आयोग के सामने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस ने आयोग को सौंपे गए अपने शुरुआती जवाब में EC पर “बिना सोचे-समझे” (Non-application of mind) और “कैजुअल” तरीके से नोटिस जारी करने का गंभीर आरोप लगाया है।
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने पार्टी की ओर से जो जवाब दाखिल किया है, उसमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर ही बड़े सवाल खड़े कर दिए गए हैं। रमेश ने अपने जवाब में स्पष्ट लिखा है कि खड़गे जी ने कभी पीएम मोदी को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ नहीं कहा, बल्कि उनके बयान का संदर्भ जांच एजेंसियों (ED, CBI) के जरिए विपक्ष को ‘डराने-धमकाने’ (Terrorising) से था। कांग्रेस का तर्क है कि चुनाव आयोग ने बिना पूरे संदर्भ को जाने, केवल सत्तारूढ़ दल (भाजपा) की शिकायत के आधार पर जल्दबाजी में नोटिस थमा दिया, वह भी चुनाव के इतने व्यस्त कार्यक्रम के बीच केवल 24 घंटे का समय देकर।
विवाद तब और गहरा गया जब कांग्रेस ने चुनाव आयोग की एक बड़ी तकनीकी और प्रक्रियागत गलती को पकड़ लिया। दरअसल, EC ने जो पहला नोटिस वेबसाइट पर अपलोड किया था, उसमें शिकायतकर्ताओं की सूची में टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन का नाम भी शामिल कर दिया था। आधे घंटे बाद आयोग को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने वह नोटिस डिलीट करके नया नोटिस अपलोड किया, जिसमें से डेरेक का नाम हटाकर केवल केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और अन्य भाजपा नेताओं का नाम रखा गया। आयोग ने इसे ‘टाइपिंग की गलती’ बताया, लेकिन कांग्रेस ने इसे हथियार बनाते हुए कहा कि यह दिखाता है कि चुनाव आयोग कितनी ‘लापरवाही’ से काम कर रहा है और विपक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कितना ‘उतावला’ है।
कांग्रेस ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि आखिर आचार संहिता का चाबुक केवल विपक्ष पर ही क्यों चलता है? जयराम रमेश ने आयोग का ध्यान शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन की ओर खींचा, जिसमें पीएम ने 131वें संविधान संशोधन बिल के न पास होने का जिक्र किया था। कांग्रेस का आरोप है कि पीएम ने इसे चुनाव के दौरान राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया, जो कि आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। इसके अलावा, कांग्रेस ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान की भी शिकायत की जिसमें उन्होंने बंगाल में चुनाव जीतने पर बेरोजगारों और महिलाओं को 3000 रुपये प्रति माह देने और मुफ्त बस यात्रा का वादा किया था। कांग्रेस ने इसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत ‘रिश्वत’ का प्रलोभन (Quid pro quo) करार दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग की साख और उसकी कार्यप्रणाली को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने विस्तृत जवाब देने के लिए और समय की मांग की है। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग कांग्रेस के इस आक्रामक रुख पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या वह भाजपा नेताओं के खिलाफ भी कांग्रेस की शिकायतों पर इसी गति से कोई एक्शन लेता है या नहीं।




